सिन्हा जी की राखी!

वैसे तो इस कहानी के नायक वर्मा जी भी हो सकते थे. मगर हमारे बड़े भाई साहब, एक नहीं, दो बड़े भाई साहब, वर्मा जी हैं और इस कहानी को पढ़ कर वर्मा जी की वाइफें, वर्मा जी का घर में घुसने पर कर्फ्यू ना लगा दें. एंड आफ्टर दैट, वर्मा जी मेरी ना लगा दें. इसलिए रिश्क नहीं ले सकता. rakhi_set13

सिन्हा जी इस कहानी के पात्र है, जो काल्पनिक हैं. किसी को भी ये लगे की उनकी बात हो रही है तो, ये क्लियर कर देता हूँ की उनकी नहीं किसी और की बात हो रही है और किसी और को लगे की उनकी बात हो रही है तो एक बार और क्लियर कर देता हूँ की उनकी नहीं, इनकी बात हो रही है. और बाकी जो है, सो, हईये हैं.

सिन्हा जी की श्रीमती जी ने सुबह ही बता दिया था. इस बार वो अपने भाइयों के घर नहीं जायेंगी. बल्कि सबको यहीं पर बुला लिया है. सिन्हा जी, जो पिछले कुछ दिनों से घर में उबला हुआ आलू का चोखा खा रहे थे, इस लिए नहीं की बिमार थे, इसलिए की प्याज के भाव सालियों के भाव जैसे बढे हुए थे. महीने के आखिरी हफ्ते में किसी से उधार भी नहीं ले सकते, कोई देगा ही नहीं, उसके भी महीने का आखिरी हफ्ता है और वो भी रक्षा बंधन के उपलक्ष में ऐसे ही कोई धासूँ प्लान बना के बैठा होगा.

सोंचा था की सालों के घर जाऊँगा तो कुछ मसालेदार-चटपटा खाने को मिलेगा ही. पेट्रोल और मिठाई में जो खर्च होगा, वो वापस बिदाई में मिले पैसे से, हिसाब बराबर हो जायेगा. श्रीमती की बात सुन कर सिन्हा जी का सारा प्लान ही चौपट हो गया, जो उन्होंने पिछले दो दिनों से बनाई थी.

सिन्हा जी मन ही मन किचकिचा कर रह गये. मन के बार किचकिचाते तो बरस-बरस के दिन कुंचा भी जाते. मरते क्या ना करते, लगे अपने मानसिक कैलकुलेटर पर हिसाब जोड़ने. मिठाई भी मुझे ही लाना पड़ेगा अब तो, मेरे घर आ रहे हैं तो खाने पीने का इंतजाम भी करना पड़ेगा. खैर! क्या क्या इंतजाम करना है, श्रीमती से पूछने के लिए जैसे हि किचन में गये, उनके तो होश उड़ गये. वहाँ पहले से ही पुलाव, छोले, पकौड़ी, कचौड़ी की तैयारी चल रही थी.

होश सम्हाल कर उन्होंने श्रीमती जी से पूछा – ये सब सामन आया कहाँ से?

श्रीमती जी का जबाब था – “मैंने अपने पास पैसे बचाये थे, उसी से मँगवाया.”

“मगर तुम्हारे पास पैसे कहाँ से आये?” – सिन्हा जी ने दूसरा सवाल किया.

“वही, जो तुम्हारे जेब से निकाल लेती हूँ.” – छन्न से पकौड़ी तलते हुए श्रीमती जी ने जबाब दिया – “भाईयों के कहा था की महीने का एंड चल रहा है और सैलरी अगले महिने ही आएगी. रक्षाबंधन के दिन मिठाइयाँ मँहगी हो जाती है और लहसुन-प्याज तो पहले से ही महँगी हुई है. तो मैंने सोंचा की उनके ऊपर और बोझ क्यों लादू. इसलिए बुला लिया अपने यहाँ”

अब एक्जेक्ट तो नहीं पता, लेकिन निश्चित तौर पर सिन्हा जी यही सोंच रहे होंगे – दुनिया में अकेला मैं ही एक समझदार नहीं हूँ.

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