अर्थला – पढ़ना एक व्यसन है (Arthla – Vivek Kumar)

“पढ़ना एक व्यसन है.”
उपरोक्त Quote मैंने इसी किताब से लिया है. अगर आपको पढ़ने का व्यसन है, या सरल भाषा में कहें की पढ़ने का नशा है, तो ये किताब आपके उस नशे की खुराक को अच्छी तरह से पूरी करती है.

जिस तरह से इस कहानी का ताना बाना बुना गया है, उसमे लगता है की पूरी किताब को एक ही बैठक में पूरी कर दें. मगर ऐसा करना संभव नहीं है. हर थोड़ी देर में आप अपने पढ़ने की प्रक्रिया को रोक कर, पढ़ चुके घटनाओं का मज़ा लेने लगेंगे. पढ़ चुके नशे का आनंद लेने लगेंगे. मैंने इस किताब को सिर्फ चार दिन में पढ़ कर पूरा कर लिया. चार दिन को चार बैठक ही मानना होगा. चार बैठक में ही पूरी किताब को पढ़ डाला, वो भी सोने से पहले. समय होता तो शायद मैं लगातार पढता रहता जब तक की आखरी पृष्ठ तक ना पहुँच जाता है.

घटनाओं का चित्रण इतना सजीव है की घटनाएं आँखों के सामने घटती हुई प्रतीत होती हैं. कभी कभी तो आप उन घटनाओं के साथ अपनी कल्पना भी जोड़ने लगेंगे.

अपनी कहानी में पाठक को भी सम्मिलित कर लेना किसी भी कहानी का सफलतम चरण होता है.
कहानी की भाषा में जो ठहराव है, हिंदी के शब्दों का प्रयोग है, वो अतुलनीय है. लेखक इसके लिए बधाई का पात्र है. किताब के बैक कवर पर लेखक विवेक कुमार की जो तस्वीर है, उस तस्वीर देख कर यकीं नहीं होता की क्या यही वो नौजवान लेखक है जिसकी भाषा शैली इतनी परिपक्व है. मगर प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं होती है और परिपक्वता को उम्र के तराजू में नहीं तौला जा सकता.

किताब में दिए गये नक्से में जम्बू द्वीप के दक्षिण के क्षेत्र का नक्सा, वर्तमान दक्षिण भारत के नक्से जैसे ही लगता है, ६३०० वर्ष पहले की काल खंड में दक्षिण भारत हिस्सा, समुद्र के अन्दर और भी ज्यादा फैला हुआ होगा. चुकी कहानी में उस हिस्से की कोई चर्चा नही की गयी है, इसलिए उस हिस्से पर किसी का ध्यान नहीं गया हो सकता है.

मैं चाहता हूँ कि इस किताब की तुलना चन्द्रकान्ता से करू, चंद्रकांता संतति से करू, अमिश त्रिपाठी जी के लिखे उपन्यासों से करूँ, आचार्य चतुरसेन की किताबों से करू, Game of Thrones से करूँ, मगर मैं करूँगा नहीं, क्योंकि ये किताब अपने आप में एक मिशाल बनने वाली है. मुझे इसके दुसरे अंक का बहुत बेसब्री से इंतजार है…

सामान्यतः ऐसी कहानियाँ पहले इंग्लिश में छपती हैं, बाद में हिंदी में अनुवाद होती हैं. मगर इस बार उल्टा होने वाला है. लगभग साढ़े चार सौ पन्ने की किताब इतने कम मूल्य पर, अपने आप में एक अजूबा है.

अर्थला को best seller की पंक्ति में खड़े होने के लिए विवेक कुमार को अग्रिम बधाई !!


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