काला बिल्ला और दही की कटोरी

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कहावत है की बिल्ले की भाग्य से छींका टुटा, मगर काला बिल्ला का भाग्य इतना भी ठीक नहीं था की कोई छींका टूटे. छींका टूटने के चक्कर में काला बिल्ला सुबह से कई बार छींक भी चूका था.

 

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कई लोगो ने समझाया कल्लू तुझे जुकाम हो गया है, दही के चक्कर में और ना पड़, मगर बिल्ले को तो दही ही चाहिए. वो बगल के पडोसी के घर से टेबल उठा लाया और टेबल पर चढ़ कर छींका से दही का मटका उतारने की कोशिश करने लगा, इतने में बगल का पडोसी आया और अपने टेबल लेकर चला गया. निचे से टेबल हटते हैं काला बिल्ला हवा में लटक गया.

तभी बाहर से गली का सबसे बदमाश बच्चा अन्दर आया और बिल्ले को हवा में लटकता देखा कर मुस्कुरा उठा. बिल्ले ने भी लड़के को देखा और उसे मुस्कुराते हुए कर लड़के की मनसा समझ गया और लगभग गिडगिडाते हुए हुआ बोला- देख मैं लटका हुआ हुआ तो तू निचे से मेरी पेंट खिंच का ना भागना,,,मैंने अन्दर कुछ नहीं पहना है.

लड़का कुछ बोला नहीं, खड़े खड़े मुस्कुराता रहा, और अचानक से उछल कर उसने बिल्ले के पिछवाड़े पर जोर से लात मारी और भाग खड़ा हुआ. लात इतनी जोर से पड़ी थी की बिल्ला अपने दोनों हाथों से अपने पिछवाड़े को सहलाने लगा, वो भूल चूका था की वो अपने हाथों के सहारे हि छींके से लटका हुआ है, हाथ छोड़ते हि बिल्ला भड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा.

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गिरने की जोरदार आवाज सुन कर बगल के कमरे में उसकी माँ रोटी पका रहा थी, उसे लगा की कोई बिल्ली छींके से दही खाने की कोशिश में गिर पड़ी है, वो वहीँ से बैठे बैठे अपने हाथ में थमें बेलन फेंक मारी. बेलन 220 के स्पीड में उड़ती हुई आई और बिल्ले के टाट पर खटाक से लगी और बिल्ले की खोपड़ी में घुमड़ निकल गया, बिल्ले अपने सर के घुमड़ को सहलाते हुए बोला – वाओ! अब मेरे पास एक्स्ट्रा दिम्माग हो गया है. अब इस दिम्माग का इस्तेमाल कर के मैं दही खाऊंगा.

और वाकई में, मार खाकर उसका दिमाग घोड़े की तरह सरपट भागने लगा. काला बिल्ला दही खाना भूल कर, अपने भागते हुए दिमाग को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ा. लेकिन घोड़े की तरह भागते हुए दिमाग के पीछे दौड़ते दौड़ते काला बिल्ला, कुत्ते की तरह हांफने लगा.  काला बिल्ला अपने भागते दिमाग को पकड़ नहीं पाया और उसे बिना दिम्माग के ही घर वापस आना पड़ा.

जैसे ही वो घर में दाखिल हुआ, उसकी नजर फिर से दही के मटके पर पड़ी, जो छींके से लटक रही थी. बिल्ले ने मटके की तरफ देखा, उसे लगा की मटक उसी को को देख कर उसका मजाक उड़ा रहा है. बिल्ले को लगा की, बाकी लोगो की तरह ये भी मेरा मजाक उड़ा रहा है तो बिल्ले ने वही पर पड़े बेलन को उठाया और फेंक कर मटका तोड़ दिया.

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मटका टूटते हि उसके अन्दर का सारा रंग भरभरा कर बाहर गिर पड़ा और काला बिल्ला नीले रंग में रंग कर के नीला बिल्ला बन गया. दिमाग नहीं होने के बावजूद भी बिल्ला समझ गया इस मटके में दही नहीं थी, ये होली खेलने वाला मटका था. जिसमे रंग छुपा कर रखा हुआ था. बिल्ले ने सोंचा की मुझे यहाँ से भाग लेना चाहिए, सारे कमरे में रंग फैला हुआ है, अगर उसकी माँ ने देख लिए तो वो उसे मार मार कर लाल कर देगी. काला से नीला हुआ बिल्ला, मार खा कर लाल होने को तैयार नहीं था. वो वहां से भाग खड़ा हुआ.

घर से बाहर भागते ही, बिल्ले के पडोसी ने बिल्ले को देख लिया. नीले रंग वाले बिल्ले को उसका पडोसी पहचान नहीं पाया, पडोसी को लगा ये कोई मूंहनोचवा है. ये ख्याल आते ही पडोसी ने घर से डंडा निकला और बिल्ले के पिछवाड़े पर सूत दिया. डंडा ठीक उसी जगह लगा, जहाँ पर गली के बदमाश लड़के ने उछल कर लात मारी थी. चोट लगते ही बिल्ला दर्द से चीख पड़ा. बिल्ले की आवाज सुनते हि पडोसी ठिठक गया और सोंचते लगा, ये तो सिन्हा जी के बेटे की आवाज लग रही है, मगर ये नीले रंग में क्यों रंगाया है.

पडोसी ने घर से एक बाल्टी पानी लाया और छपाक से बिल्ले के चहरे पर फेंक मारा. पानी पड़ते हि बिल्ले का नीला रंग थोडा धुल गया और उसका चेहरा थोडा थोडा दिखने लगा. मगर अभी भी बिल्ला सही से पहचान में नहीं आ रहा था. जिसके कारण पडोसी घुर घुर कर उसे देखने लगा ताकि उसकी पहचान की जा सकते.

पडोसी को अपना चेहरा घुर घुर कर देखते हुए पाकर, बिल्ला के मूंह से गाने के बोल फुट पड़े – चेहरा क्या देखते हो? दिल में उतर कर देखो ना! ढीन्चक पूजा के जैसे आवाज में गाता सुन कर पडोसी तुरंत पहचान गया – अरे! ये तो अपना काला बिल्ला है.

फिर पडोसी उसे अपने घर ले गया, और सब हाल पूछा. बिल्ला बोला की वो दही खाना चाहता था. मगर दही के चक्कर में ये सब हो गया. पडोसी ने कहा – बस इतनी सी बात? हम अभी तुम्हे दही चटाते हैं? और पडोसी से उसे एक कटोरी दही खाने को दिया.

काला बिल्ला कटोरी से दही निकाल कर चपाचप चपाचप खाने लगा…

 

 

 

 

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