काला बिल्ला की कहानी उसी की जुबानी 1

मैं अब अपनी कहानी सुनाने जा रहा हूँ. मैं यानी की काला बिल्ला.

ना तो मैं काला हूँ और ना ही मैं बिल्ला हूँ, फिर भी मेरे दोस्त मुझे काला बिल्ला के नाम से बुलाते हैं. क्योकि मेरे कुकर्म ही ऐसे हैं की लोग मुझे काला बिल्ला बोलेन.

मैं आप सब को अपनी जीवनी सुनाऊंगा, और जिसे सुन कर  आप लोग ही निर्णय लीजियेगा की मेरे दोस्त मुझे काला बिल्ला क्यों कहते हैं.

एक बार बचपन में मैं फूटबाल खेल रहा था, और मैंने अपनी ही टीम में 5 गोल कर के विरोधी टीम को 5 गोल से जीता दिया. मेरी टीम वालों में मुझे खूब धोया, मैं भी खूब धुलवाया. जब शारीर का एक अंग भी धोने के लिए नहीं बचा तो मैं बेहोश हो गया. होश आया तो मैंने खुद को सड़क के किनारे वाले नाले में पाया. वहाँ से बहुत सड़ी हुई दुर्गन्ध आ रहे थी, जिससे कारण होश में आने के तुरंत बाद ही मई फिर से बेहोश हो गया. दोपहर से शाम हो गयी. मैं उसी नाले में पड़ा रहा, तभी किसी की नजर मेरे ऊपर पड़ी उस भले ोमानुष ने मुझे नाले से निकाल कर सड़क के बगल में लेता दिया और कहीं से जाकर ठेला लेकर आया और मुझे उस पर लिटा कर मुझे मेरे घर पहुंचा दिया.

घर वालों ने मुझे घर के अन्दर नहीं जाने दिया और घर के बाहर ही मुझे एक बाल्टी पानी और और एक साबुन दे दिया, वही साबुन जो पकहना करने के बाद हाथ माजने के काम आता है. अब्ब आप ही बताइए जो आदमी सारे दिन नाले में पड़ा रहे उसको नहाने के लिए एक बाल्टी पानी मिले तो भला वो क्या नहायेगा क्या धोएगा.  मैंने घर वालों से कहा की मैं एक बाल्टी पानी से नहीं नाहा सकता हूँ. घर के अन्दर से किसी ने बोला तप उसी बाल्टी में से एक चुल्लू पानी ले और उसमे डूब के मर जा.

मैंने सोंचा अहमकों का घर है ये एक  बाल्टी पानी से मैं नाहा तो पा नहीं रहा हूँ, और ये मुझे चुल्लू भर पानी में डूबने की बातां कर रहे हैं. खैर मैं जैसे तैसे काम चलाया और घर के अन्दर गया. मेरे घर के अन्दर जाते ही सारे लोगो ने अपने अपने नाक बंद कर लिए, अब मुझे ध्यान आया की मेरे अन्दर से बदबू भी आ रही है. और इसी बदबू को मिटाने के लिए घर वालों में मुझे पैखनिया साबुन दिया था की ले बेटे साफ़ कर ले अपने आप को, मगर मुझे समझ ना आया था.

इसके पहले मेरे ऊपर मक्खियाँ ैंभिनभिनाने लगती मैं सीधे बाथरूम में चला गया. और सबसे पहले कुल्ला किया, क्योकि नाले का पानी मेरे मुंह के अन्दर तक चला गया था.

फिर मैं नहा धोवा का बाहर निकला तो देखा की मैंने पुरे कमरे में अपने भीगे हुए जूते से कचड़ा फैला दिया था. मैंने अपने पैरों की तरफ देखा, जूते अभी भी मेरे पैरों में ही थे. मैंने जूते के फीते खोले और जूते निकाल कर सूंघने लगा. मैं ये चेक करने की कोशिश कर रहा था की अगर मेरे जूते नहीं महक रहे होंगे तो मुझे इन्हें नहीं धोने पड़ेंगे.

मगर जूते महक रहे थे. और सड़ी हुई टट्टी की तरह महक रहे थे…मुझे उबकाई आने लगी, मुझे लगा की मैं उल्टी कर दूँगा, लेकिन मैंने किया नहीं. अगर मैं उलटी कर देता तो सभी लोग बधाई देने लगते, मुबारक हो आप माँ बनने वाले हैं, जैसा लोगो ने पम्मी आंटी को बधाई दिया था. मेरे मुंह में थोडा बहुत उल्टी आ गयी थी लेकिन मैं उसे वापस पि गया और उसे बाहर नहीं निकलने दिया. किसी को कानो कान खबर नहीं हुई की मैं उलटी पि गया था.

क्रमशः

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