मिदनापुड के मैनेजड साहब midnapur-ke-manager-sahab

नए शहर में नया ठीकना ढूंढना थोड़ा मुश्किल होता है। यह मुश्किल तब थोड़ी और बढ़ जाती है जब बंदा बैचलर हो। दिल्ली में भी इस तरह की मुश्किल आयी थी मगर पूरा नाम बताने पर मुश्किल छूमंतर भी हो जाती थी। सर नेम से नौकरी में तो कभी फायदा नहीं हुआ, किराये का मकान लेने में मदद जरूर मिली । सभ्य समाज का समझ कर घर किराए पर मिलने में आसानी तो हुई , लेकिन सबसे बड़ी मुसीबत यही बन गयी। सभ्य नहीं होते हुए भी सभ्य होने का दिखावा करना सबसे दुष्कर कार्य होता है। सभ्य होने का चोला तभी तक पहना जाता है जब तक दुसरो को दिखाना होता है। बाकी अन्य समय में सभी अपने अपने कैजयूअल तरीके से रहते है।
साउथ में किराए का मकान ढूँढना बहुत मुश्किल है , अगर ढूंढने वाला बैचलर हो तो। ऐसे में, तात्कालिक तौर पर पीजी ही संकट मोचक का काम करता है। पीजी का फुल फॉर्म पेईंग गेस्ट होता है, लेकिंग मैंने पीजी का नया फुलफॉर्म ईजाद किया है और वो है ऊँची दुकान फिकी पकवान।
पीजी में मिले बिछावन और अपने साथ लाये बैग, दोनों को व्यवस्थित करने के बाद खिड़की खोलकर देखा तो समुद्र लहरे मार रहा था। समुद्र से आती हुई ठंडी हवा और समुद्र की उठती गिरती लहरों ने पाँच मिनट में ही सारी थकावट निचोड़ कर निकाल डाली। शायद यही एक कारण रहा हो इस दुकान के ऊँची होंने का।
थोड़ी देर में एक अधेड़ उम्र के मैनेजर साहब आये, बोले- फडेश हो जाइये, चाय बनवाकड भेज डहा हूँ। र को ड बोलता सुन कर मैंने पूछ लिया, कहाँ घर है? बिहार में? मैनेजर साहब बोले, मिदनापुड , बंगाल।
उनकी गर्व भरी आवाज सुनकर मैं मन में ही बोल कर चुप हो गया की मैं बिहार का हूँ, मेरा मतलब की मैं बिहाड का हूँ. बात को आगे बढाने की गरज से मेनेजर साहब ने पूछा, आपको पता है मिदनापूड कहाँ हैं? मैंने कहा – हाँ पता है, सोनागाछी के बगल में है..इसके बाद मैनेजर साहब रुके नही, बडबडाते हुए चले गये – बहुत बन्नेचड आदमी है..
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बाद में पीजी में रहने वाले अन्य बन्नेचड आदमियों से पता लगा की मैनेजर साहब, जब भी अपने घर का पता मिदनापूड, बंगाल बताते हैं, उनके बदन में थोड़ी अकड़ आ जाती है और गर्दन भी अकड़ कर थोड़ी ऊपर की तरफ उठ जाती है. अन्य बन्नेचर आदमियों ने यह भी बताया की मैनेजर साहब सिर्फ मैनेजर ही नहीं हैं, वो इस पीजी के सुपरवाइजर भी हैं, सफाई कर्मचारी भी हैं, चौकीदार भी हैं, और कैशियर भी हैं. मैंने जिज्ञासावश पूछ लिया, ऐसा कुछ है जो ये नहीं हैं? जबाब था की कुक नहीं हैं ये. खाना कोई और पकाता है. सारे दिन इतना पकाने के बाद इनके पास और हिम्मत नहीं बचती की खाना पका सके, सो खाना पकाने के लिए कोई और आता है. यानी आल इन वन होते होते रह गये.
पीजी के बकाया पैसों का भुगतान करने के लिए मुझे एटीएम जाना था, मैनेजर साब से नजदीक में कोई एटीएम है पूछने पर बताया की उधर थोड़ी दूर जाने पर पोस्ट ऑफिस आएगा, उसके आगे ही एटीएम है. शाम के समय एटीएम की तलाश में निकल पड़ा, थोड़ी दूर ही चला था की पोस्ट ऑफिस आ गया, उससे थोडा और आगे गया मगर एटीएम ना दिखाई दिया, थोडा और आगे बढ़ा, थोडा और आगे बड़ा मगर एटीएम फिर भी नहीं दिखाई दिया.. दिल्ली के ब्लू लाइन्स के बसों में कंडक्टर हमेशा चिल्लाते रहते थे, आगे बढ़ो- आगे बढ़ो, इसी गुरु मंत्र को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ते-बढ़ते समुद्र के किनारे पहुँच गया. क्या विशाल समुद्र था! देखा तो देखता ही रह गया.
कोलंबस के कम हालत मेरी भी नहीं थी, वो इंडिया ढूँढने निकला था, अमेरिका पहुँच गया था. मैं एटीएम ढूँढने निकला था, समुद्र किनारे पहुँच गया था. बहुत भीड़ थी वहाँ, मगर ध्यान सिर्फ उन दो लोगो के बातचीत पर अटका, जो हिंदी में बात कर रहे थे. बाकी लोग क्या बात कर रहे थे. समझ के इस पार तो कतई नहीं था.
दूसरा आदमी बोल रहा था, इस समुद्र का कोई छोर है की नहीं? इस पर तीसरा बोला – जहाँ खड़े हो, एक छोर तो वही है. दूसरा आदमी बोला- समुद्र किनारे आयें हैं तो चलो कम से कम समुद्र का पानी ही छू लेते हैं…यह सुन मैं वहाँ से हट गया, क्योंकी हमारे तरफ पानी छूने का मतलब पानी सिर्फ पानी छूना नहीं होता है.
काफी देर बाद के बाद मैं वापस आने लगा, रास्ते में फिर से पोस्ट ऑफिस आया, उससे थोडा और आगे बड़ा तो मुझे एटीएम दिखाई दिया. एटीएम से पैसा निकालने के दौरान में समझने की कोशिश कर रहा था की मैनेजर साब ने जो बताया की एटीएम पोस्ट ऑफिस से थोड़ा ही आगे हैबताया था, वो उन्होंने जाते समय थोडा आगे बताया था या आते समय थोडा आगे बताया था………… (जारी है …)

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