शिव यानी शंकर यानी महादेव

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शिव यानी शंकर यानी महादेव यानी देवों के देव दरअसल कमज़ोर, वंचित, असभ्य, अनार्य, जंगली, औघड़, बैलट और अराजकों के देवता हैं जिन्हें वर्चस्वशाली पंडा संस्कृति ने कभी भी मुख्यधारा के सांस्कृतिक विमर्श में जगह नहीं दी। शिव नीलकंठ हैं। मानवता को बचाने के लिए ज़हर पी गए। शिव अर्धनारीश्वर हैं। जब जेंडर विमर्श नाम की चिडि़या नहीं हुआ करती थी, तब शिव का अर्धनारीश्वर रूप पूजनीय था। शिव एक साथ यिंग भी हैं और यांग भी। शिव के साथ सांप हैं, बाघ हैं, भूतप्रेत हैं, जंगल है, श्मशान है, श्मशान की राख है, नृत्य है, संगीत है, ताण्डव है, सूरज से प्रकाश मांगता वंचित चांद है, पंडों का मैल धोने वाली भगीरथी है और इन सब के स्वामी होने के बावजूद उनमें एक निर्लिप्तता है। शिव सबाल्टर्न हैं, सत्य हैं, इसीलिए सुंदर हैं।

योगी आदित्यनाथ सांसद होंगे, नेता होंगे, लेकिन वे हिंदू नहीं हैं। सनातनी भी नहीं हैं। सन्यासी तो बिलकुल भी नहीं। वरना वे शिव को राष्ट्रपिता बनाने की बात कहने का दुस्साहस सपने में भी नहीं कर पाते। आदित्यनाथ अपने नाथ सम्प्रदाय के सही उत्तराधिकारी भी नहीं हैं क्योंकि उन्हें रत्ती भर भी इस सम्प्रदाय की समझ नहीं है। नाथ का मतलब होता है रक्षा करने वाला, मूल ईश्वर यानी शिव। मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदर) से लेकर नागनाथ तक जो नवनाथों की परंपरा है, वह नौ नारायणों की अवतार है जो धरती पर भौतिक कृत्यों के लिए ज़िम्मेदार थे। योगी आदित्यनाथ इस परंपरा पर धब्बा हैं।

आज नाथ सम्प्रदाय के तीन पीठ हैं- गोरखनाथ मठ के आदित्यनाथ, नंदीनाथ मठ के बोधिनाथ वेलंस्वामी और वैराग पंथ के नारायण नाथ। आदित्यनाथ ने शिव के बारे में ऐसा घटिया बयान देकर न केवल समूची नाथ परंपरा का मानमर्दन किया है, बल्कि बाकी दो पंथों के जीवित नाथ गुरुओं की भी एकतरफा उपेक्षा की है। यह सही है कि योगी के कह देने भर से शिव राष्ट्रपिता नहीं हो जाते, वे महादेव ही रहेंगे लेकिन भारतीय विचार परंपरा को जानने वालों को एक अफ़सोस जरूर रहेगा कि भारत की सबसे समृद्ध सिद्ध परंपरा की नाथ धारा की कमान आज एक ऐसे शख्स के हाथ में है जो उसके योग्य नहीं है। आदित्यनाथ गिरोह की ही भाषा में कहूं तो- भोले शंकर का अपमान, नहीं सहेगा हिन्दुस्तान!!!

 

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श्री श्री श्रीवास्तव जी के फेसबुक वाल से साभार

 

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